चर्च झूठ बोलता हैं
जी हां यह सच है कि धर्मांतंरण के मामले पर `चर्च झूठ बोलता है। चर्च से तात्पर्य यहां वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च से है जो कि भारत में `कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया´ द्वारा शासित है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विगत माह उड़ीसा के कंधमाल में एक हिन्दू संत की हत्या के बाद भड़की हिंसा में वहां मुख्य कारण मंतातरण है, यह समस्या एक विकराल रुप लेती जा रही है, जिसमें केन्द्र की सरकार से लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें तक अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही है। उड़ीसा को मुद्दा बना कर `आस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देश भारत पर दबाव बना रहे हैं।वहीं दूसरी तरफ चर्च बड़ी सफाई से यह झूठ बार -बार बोल रहा है कि `हम धर्मांतरण नहीं करते´ "धर्मांतरण कराने वाले गुप्र या चर्च दूसरे है।" स्पष्ट है कि कैथोलिक चर्च धर्मांतरण के आरोप को खारिज करता है। पिछले दिनों कई टी.वी.चैनलों और आंग्रेजी अखबारों को कैथोलिक चर्च के कई अधिकारियों, बिशपों एवं प्रवक्ताओं ने यहीं कहा कि `हम तो निर्दोष हैं´-हम धर्मातरण करते ही नहीं, वे लोग कोई और हैं।कैथोलिक चर्च के अधिकारियों का यह तर्क `चर्च की गतिविधियों की मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नही उतर सकता´ क्योंकि एक ओर तो `वैटिकन/ पोप´ विश्व के कोने-कोने में जाकर समस्त पृथ्वी पर `ईसाइयत´ के विस्तार पर जोर दे रहे हैं। खुद `पोप जॉन पॉल द्वितीय´ ने एक दशक पूर्व अपने भारत प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी दक्षिण एशिया में चर्च की होगी। लेकिन आज उनके तमाम अनुयायी `बिशप, फादर, नन्स जोर देकर कह रहे है है कि किसी को ईसाई बनाने या उसका मत-परिवर्तन करने से हमारा कोई लेना देना नहीं है -`हिन्दुत्वादी कट्टरपंथी हमें बक्शें और जो अन्य ईसाई मिशनरी यह कार्य कर रहे हैं उनसे ही निपटें´। इनके झूठ से पर्दा उठाता है पोप का 10 नवम्बर 1994 को एशिया के बिशपों के नाम लिखा गया एक पत्र जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एशिया के इस भाग में (भारत और चीन) उनके प्राचीन धर्म और संस्कृति के कारण `क्रििष्चयानिटी´ के प्रचार पर दबाव बनता है और टकराव की स्थिति उत्पन होती है। यह ईसाइयत के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हिन्दुइज्म और बुद्धिइज्म को यहां के लोगों ने नशे की सी आदत में अपना रखा है। इस पत्र से पता चलता है कि `पोप और उनके अनुयायियों की मानसिकता कैसी है। उनकी नजर में `हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी मात्र अंधविश्वास के नशे में डूबे हुए लोग है।´जिन्हें कैथोलिक चर्च उस नशे से उबार कर स्वस्थ्य मानसिकता देकर ईसाइयत द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह एक तरह से हिन्दुओं एवं बौद्धों को गाली देने जैसी बात है।वास्तविकता यह है कि अब हिन्दुओं के सामने भी अपनी संस्कृति और धर्म के आस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति पर सदियों से आक्रान्ताओं ने जुल्म ढाये हैं। कभी उन्हें काफिर कह कर कत्लेआम का ग्रास बनाया गया तो कभी उन्हें मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी कहकर गाली दी गई। यह सिलसिला वर्तमान समय तक चल रहा हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चारों दिशाओं - धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति - पर अलग अलग तरह के मुलम्मे चढ़ाकर सुनियोजित आक्रमण हो रहे है। ऐसी स्थिति में अस्तित्व की रक्षा के लिए साम,दाम,दण्ड-भेद की नीतिया अपनाई ही जायेगी।नई दिल्ली में जन्तर मंतर पर धरने पर बैठे `कैथोलिक आर्चडायसिस ऑफ दिल्ली के प्रवक्ता ने सफेद झूठ बोलते हुए मीडिया से कहा कि ``वैटिकन ने हमें स्पष्ट आदेश दिया है कि इंच मात्र या इशारे मात्र से भी किसी को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित नहीं करें. उक्त चर्च अधिकारी कितना बड़ा झूठ बोल रहा है यह वैटिकन द्वारा जारी इस आदेश से साफ होता है। `एशिया फार ग्लेसिया´ में पोप/ वैटिकन- बिशपों, फादरों, ननों, कार्डीनल, डीकन और लेइटी को साफ निर्देश देता है कि वह एशिया में कैथोलिक चर्च की गतिविधियों को विस्तार देने में जुट जाए। ताकि एशियावासियों को अधिक से अधिक संख्या में `नया जीवन´ अर्थात मतांतरण द्वारा बचाया जा सकें। स्पश्ट है कि एशिया की जनता बगैर चर्च की शरण में गए मृत्प्राय है जिसे `पोप´ द्वारा नियुक्त किये गए बिशप, कार्डीनल, प्रीस्ट, नन्स व अन्य बप्तिस्मा (क्रििष्चयनटी संस्कार) पाये लोग ही नवजीवन दें सकते है।
(अपोस्ल एंग्जार्टएश्न-एक्लेसिया फॉर एशिया- पोप का क्रांतिकारी अह्वान है, जो पोप के धर्मराज्य को समस्त एशिया में स्थापित करने का दिशा-निर्देश देता है.)
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Sunday, March 29, 2009
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