Sunday, March 29, 2009
चर्च झूठ बोलता हैं
जी हां यह सच है कि धर्मांतंरण के मामले पर `चर्च झूठ बोलता है। चर्च से तात्पर्य यहां वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च से है जो कि भारत में `कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया´ द्वारा शासित है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विगत माह उड़ीसा के कंधमाल में एक हिन्दू संत की हत्या के बाद भड़की हिंसा में वहां मुख्य कारण मंतातरण है, यह समस्या एक विकराल रुप लेती जा रही है, जिसमें केन्द्र की सरकार से लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें तक अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही है। उड़ीसा को मुद्दा बना कर `आस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देश भारत पर दबाव बना रहे हैं।वहीं दूसरी तरफ चर्च बड़ी सफाई से यह झूठ बार -बार बोल रहा है कि `हम धर्मांतरण नहीं करते´ "धर्मांतरण कराने वाले गुप्र या चर्च दूसरे है।" स्पष्ट है कि कैथोलिक चर्च धर्मांतरण के आरोप को खारिज करता है। पिछले दिनों कई टी.वी.चैनलों और आंग्रेजी अखबारों को कैथोलिक चर्च के कई अधिकारियों, बिशपों एवं प्रवक्ताओं ने यहीं कहा कि `हम तो निर्दोष हैं´-हम धर्मातरण करते ही नहीं, वे लोग कोई और हैं।कैथोलिक चर्च के अधिकारियों का यह तर्क `चर्च की गतिविधियों की मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नही उतर सकता´ क्योंकि एक ओर तो `वैटिकन/ पोप´ विश्व के कोने-कोने में जाकर समस्त पृथ्वी पर `ईसाइयत´ के विस्तार पर जोर दे रहे हैं। खुद `पोप जॉन पॉल द्वितीय´ ने एक दशक पूर्व अपने भारत प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी दक्षिण एशिया में चर्च की होगी। लेकिन आज उनके तमाम अनुयायी `बिशप, फादर, नन्स जोर देकर कह रहे है है कि किसी को ईसाई बनाने या उसका मत-परिवर्तन करने से हमारा कोई लेना देना नहीं है -`हिन्दुत्वादी कट्टरपंथी हमें बक्शें और जो अन्य ईसाई मिशनरी यह कार्य कर रहे हैं उनसे ही निपटें´। इनके झूठ से पर्दा उठाता है पोप का 10 नवम्बर 1994 को एशिया के बिशपों के नाम लिखा गया एक पत्र जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एशिया के इस भाग में (भारत और चीन) उनके प्राचीन धर्म और संस्कृति के कारण `क्रििष्चयानिटी´ के प्रचार पर दबाव बनता है और टकराव की स्थिति उत्पन होती है। यह ईसाइयत के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हिन्दुइज्म और बुद्धिइज्म को यहां के लोगों ने नशे की सी आदत में अपना रखा है। इस पत्र से पता चलता है कि `पोप और उनके अनुयायियों की मानसिकता कैसी है। उनकी नजर में `हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी मात्र अंधविश्वास के नशे में डूबे हुए लोग है।´जिन्हें कैथोलिक चर्च उस नशे से उबार कर स्वस्थ्य मानसिकता देकर ईसाइयत द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह एक तरह से हिन्दुओं एवं बौद्धों को गाली देने जैसी बात है।वास्तविकता यह है कि अब हिन्दुओं के सामने भी अपनी संस्कृति और धर्म के आस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति पर सदियों से आक्रान्ताओं ने जुल्म ढाये हैं। कभी उन्हें काफिर कह कर कत्लेआम का ग्रास बनाया गया तो कभी उन्हें मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी कहकर गाली दी गई। यह सिलसिला वर्तमान समय तक चल रहा हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चारों दिशाओं - धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति - पर अलग अलग तरह के मुलम्मे चढ़ाकर सुनियोजित आक्रमण हो रहे है। ऐसी स्थिति में अस्तित्व की रक्षा के लिए साम,दाम,दण्ड-भेद की नीतिया अपनाई ही जायेगी।नई दिल्ली में जन्तर मंतर पर धरने पर बैठे `कैथोलिक आर्चडायसिस ऑफ दिल्ली के प्रवक्ता ने सफेद झूठ बोलते हुए मीडिया से कहा कि ``वैटिकन ने हमें स्पष्ट आदेश दिया है कि इंच मात्र या इशारे मात्र से भी किसी को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित नहीं करें. उक्त चर्च अधिकारी कितना बड़ा झूठ बोल रहा है यह वैटिकन द्वारा जारी इस आदेश से साफ होता है। `एशिया फार ग्लेसिया´ में पोप/ वैटिकन- बिशपों, फादरों, ननों, कार्डीनल, डीकन और लेइटी को साफ निर्देश देता है कि वह एशिया में कैथोलिक चर्च की गतिविधियों को विस्तार देने में जुट जाए। ताकि एशियावासियों को अधिक से अधिक संख्या में `नया जीवन´ अर्थात मतांतरण द्वारा बचाया जा सकें। स्पश्ट है कि एशिया की जनता बगैर चर्च की शरण में गए मृत्प्राय है जिसे `पोप´ द्वारा नियुक्त किये गए बिशप, कार्डीनल, प्रीस्ट, नन्स व अन्य बप्तिस्मा (क्रििष्चयनटी संस्कार) पाये लोग ही नवजीवन दें सकते है।
(अपोस्ल एंग्जार्टएश्न-एक्लेसिया फॉर एशिया- पोप का क्रांतिकारी अह्वान है, जो पोप के धर्मराज्य को समस्त एशिया में स्थापित करने का दिशा-निर्देश देता है.)
गर्भ से कब्र तक सिर्फ भेदभाव
दलितों की मुक्ति के लिए चर्च अधिकारियों में कर्तव्यबोध जगाने हेतु बाइबल से याशयाह नबी के इस कथन का जिक्र किया गया है- न्याय करो और दबे हुओं को छुटकारा दिलाओ.´अच्छा है कि आखिर चर्च अधिकारियों को ईसाइयत के अंदर हाशिए पर पड़े इन करोड़ों लोगो की याद तो आयी, पर प्रश्न यह उठता है कि सैकड़ों साल पहले हिन्दू समाज से टूटकर ईसाई चर्च की गोद में गये धर्मांतरितों के वंशज आज भी दलितों की श्रेणी में क्यों पड़े हुए हैं? चर्च की गोद में जाने के बाद यदि उन्हें सामाजिक-आर्थिक विषमता से छुटकारा नहीं मिल सकता तो उनके जीवन में चर्च का योगदान क्या हैं? जब चर्च के नेता यह दावा करते हैं कि भारत की 70 प्रतिशत ईसाई जनसंख्या दलितों की श्रेणी में आती हैं तब वे खुले मन से यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि चर्च उन्हें सामाजिक-आर्थिक समानता देने में असफल रहा हैं ? चर्च के भीतर भी उनके प्रति भेदभाव क्यों बरता जा रहा हैं? दलित ईसाइयों की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जिस चर्च नेतृत्व को आज अपराधियों के कठघरे में खड़ा होना चाहिए था, वही आज सीनाजोरी के साथ निर्लज्जतापूर्वक स्वीकार कर रहा है कि भारत की ईसाई जनसंख्या का 70 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से दलित है, इसलिए उन्हें अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने के लिये संविधान संशोधन किया जाना चाहिए । लेकिन वह यह बताने को तैयार नही है कि चार पॉच सौ वर्षों तक उसकी छत्रछाया में रहने के बाद भी इतना बड़ा वर्ग सामाजिक एवं आर्थिक असमानता, अस्पृश्यता और दारिद्रय का शिकार क्यों है? यह ऐतिहासिक सत्य है कि समाज के निचले तबके के वंचित वर्गों को मिशनरियों ने हिन्दू धर्म को उनकी इस दर्दनाक स्थिति का जिम्मेदार बताकर बड़े स्तर पर भारत में धर्मांतंरण का किया है परन्तु सैकड़ों सालों बाद भी अगर ईसाइयत में वह उससे भी बुरी स्थिति में आज है तो क्या चर्च अधिकारी इसके लिए दोषी नही है?
चर्च नेतृत्व जातिवाद को ईसाइयत में समाप्त न कर पाने के लिए भी हिन्दू महौल को दोषी मानता है लेकिन प्रश्न खड़ा होता है कि कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट जैसे संगठित समुदाय जो वेटिकन और वर्ल्ड चर्च कौंसिल के दिशा-निर्देशों के अंर्तगत चल रहे है उसमें धर्मांतरित ईसाइयों को बराबरी के अधिकार देने में हिन्दू कैसे अड़चन पैदा कर सकते है?
चर्च नेतृत्व अपनी असफलता को छिपाने के लिए ही अपनी नाकामी का ठीकरा हिन्दुओं के सिर फोड़ रहा है। भारत में पुर्तगालियों के समय से ही चर्च ने अपना विस्तार करना शुरू कर दिया था। अंग्रेजी शासन के दौरान इसमें बहुत तेजी आई संपत्ति और जनसंख्या के मामले में चर्च ने अठारह सौ वर्षों (सेंट थोमस के समय से) के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। 19वीं सदी के मध्य तक समुद्र तटीय इलाकों से आगे बढ़कर पंजाब तक पुहंच चुका था। चर्च ने अपना टारगेट भारत के वंचित वर्गो की ही बनाया, हिन्दु समाज की नीची मानी जाने वाली जातियों में बड़े स्तर पर धर्मांतरण का खेल खेला गया परन्तु यह जातियां ईसाइयत में आने के बाद भी पीड़त है। पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट का मत है कि गर्भ से लेकर कब्र तक दलित `ईसाइयत´ के अंदर जातिवाद के शिकार है। देश की स्वतंत्रता के बाद बने संविधान में जहां हिन्दू समाज की नीची माने जाने वाली जातियों के लिए विशेष प्रवधान किये गये वहीं करोड़ों धर्मांतरित लोगों को उससे बाहर माना गया क्योंकि उन्होंने जाति व्यवस्था से मुक्ति के लिये धर्मांतरण का मार्ग अपना लिया था। तभी चर्च नेतृत्व की यह जिम्मेदारी हो गई थी कि वह इन लोगों को समाज में बराबरी के स्तर पर लाता परन्तु चर्च नेतृत्व ने इनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्थिति सुधारने की अपेक्षा अपने साम्राज्वाद को ही अहमियत दी. वह वंचित वर्गों को सरकारी सुविधाओं से दूर करते हुए अपने बाड़ों में लाने के कार्य में लगा रहा लेकिन यहां उसे आदिवासी समाज में मिली सफलता की तरह सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।
छोटानागपुर क्षेत्र में ही भारत के कुल कैथोलिको का 10 प्रतिशत संख्या है। उतर पूर्व के सात राज्यों में तीन ईसाई बहुसंख्यक है यहां कैथोलिक क्षेत्र की ईसाई आबादी का चौथा हिस्सा है। लेकिन अनुसूचित जातियों से ईसाइयत की शरण में आये लोगों को हिन्दु दलितों को मिलने वाली सवुधाओं से बाहर कर देने के कारण भारत की आबादी का छटा हिस्सा यानी 16 प्रतिशत दलित चर्च के साम्राज्वाद से दूर हो गया है इसलिये आज चर्च नेतृत्व का पूरा जोर धर्मांतरित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करवाने को लेकर लग रहा है। इस कारण दलित ईसाइयों और दलित हिन्दुओं के बीच टकराव एवं आपसी कटुता भी बढ़ रही है। अभी हाल ही में उड़ीसा के कंधमाल जिले में अनुसूचित जातियों की श्रेणी से धर्मांतरित हुए `पाण´ ईसाइयों एवं कंध जाति के लोगों के बीच जबरदस्त टकराव हुआ जिसमें दर्जनों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और हजारों लोग बेघर हो गये लेकिन चर्च अधिकारी अपना खेल खेलने में व्यस्त हैं. इस पूरे मामले में उन्हें धर्मांतरित ईसाइयों की चिंता कम अपने लाभ की अधिक है। सन् 1965 में केरल में कुमार पिल्लई कमेटी ने वहां के बहुसंख्यक ईसाई समाज के सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन पर अपनी रिर्पोट दी थी। सन् 1970 में संथानम रिर्पोट में साफ लिखा गया कि `हिन्दू समाज में तो अपने सामाजिक-आर्थिक पिछड़ों को ऊपर उठाने का आंदोलन प्रबल हो रहा है, किन्तु चर्च में ऐसी कोई हलचल नही है।' सन् 1975 में चिदंबरम रिर्पोट में भी ऐसी बात कही गई, पर चर्च अधिकारी मौन रहे। होना तो यह चाहिए था कि चर्च अपनी विफलता पर आत्म-मंथन करता और धर्मांतरण का धंधा बंद कर अपने अनुयायियों के विकास को महत्व देता। पर चर्च नेतृत्व ने ऐसा कुछ भी नही किया। वह दलितों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास का जोरदार प्रयास करने के बजाय उनपर अपना शिकंजा बनाए रखने के लिए उन्हें अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की मांग करने लगा। मैंने अपनी एक पुस्तक `आस्था से विश्वासघात´ पुस्तक में भारतीय वंचित ईसाइयों की पीड़ा जाहिर की है कि जब चर्च नेतृत्व ने देखा कि अब उसके बाड़े में असंतोष बढ़ने लगा है, कभी भी विद्रोह की स्थिति पैदा हो सकती है और उसका बाड़ा खाली हो सकता है तब उसने धर्मांतरित ईसाइयों के असंतोष को सरकार की तरफ मोड़ते हुए नई रणनीति `अनुसूचित जाति के दर्जे की मांग´ शुरू कर दी। हालांकि ऐसी मांग के पूरा होने की संभावना दूर-दूर तक भी दिखाई नहीं देती। क्योंकि चर्च नेतृत्व का मकसद इस मांग के तहत भारतीय दलित ईसाइयों को अपने बाड़े में बनाए रखना और साथ ही राजनीतिक पार्टियों पर अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए दबाब बनाना भी है। वहीं दूसरी और राजनीतिक पार्टिया दलित ईसाइयों के वोट बटोरने के लिए समितियों एवं कमीशनों की स्थापना करती रहती है और उनकी रपटें चर्च एवं सरकार के लिए रद्दी बराबर होती है। प्रोटेस्टेन्ट और कैथोलिक, दोनों ही चर्चों ने वंचित लोगों को अपने साम्राज्वाद के परे कभी देखा ही नहीं है। इन वर्गों की मुक्ति में चर्च नेतृत्व की कोई रुचि नहीं रही है। उत्पीड़न, रोजमर्रा का संघर्ष, देश के विभिन्न भागों में व्याप्त जातिवाद, अशिक्षा, (सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में सबसे ज्यादा अशिक्षित धर्मांतरित ईसाई ही है) गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय की तलाश और चर्च ढांचे में अपने अधिकारों को पाने हेतु संघर्ष -इनमें से किसी में भी चर्च नेतृत्व की कोई रुचि नहीं रही। इस समय देश में चर्च नेतृत्व 40,000 हजार से अधिक शैक्षणिक, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक विकास से सम्बधित संस्थाए चला रहा है। भारत सरकार के बाद चर्च के पास सबसे अधिक भूमि है. चर्च के अधिकार में भारत की सबसे बेहतर शिक्षण संस्थाए है जिनका उपयोग वह अपने स्वार्थ के लिये कर रहा है. ईसाइयों का पैसा, उनकी इमारते एवं सारे ईसाई संसाधनों का इस्तेमाल वंचित वर्गों/धर्मांतरित ईसाइयों को छोड़कर व्यक्तिगत लाभ के लिये किया जा रहा है। जिस भेदभाव, उत्पीड़न एवं जाति व्यवस्था से छुटकारे के लिये वंचितों ने अपने पूवर्जों का धर्म त्यागकर चर्च नेतृत्व का दामन थामा था आज वहीं चर्च नेतृत्व अपने घर में इन करोड़ों वंचितों को उससे मुक्ति देने की अपेक्षा इस बुराई को अपने स्वार्थ के लिये कानूनी जामा पहनाने के लिये जोर लगा रहा है। चर्च अधिकारी अगर `दलितों की मुक्ति´ के लिये इतने ही ईमानदार है तो उन्हें चाहिए कि वह अपने घर (चर्च ढांचे में) उन्हें उनकी संख्या के मुताबिक प्रशासिनक भागीदारी उपलब्ध करवाये, धर्म-प्रचार के नाम पर खर्च हो रहे करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल उनके विकास के लिए किया जाए। प्रोटस्टेंट की तरह ही कैथोलिक चर्च में बिशप का चुनाव वेटिकन के स्थान पर स्थानीय कलीसियों से करवाया जाए। यूरोपीय चश्में की जगह जमीनी धरातल पर दलितो की समास्याओं को समझा जाए। चर्च के संस्थानों में उन्हें समान अवसर मुहैया करवाये जाए तभी `दलित मुक्ति संडे' जैसे आयोजनों को सफल माना जा सकता है।
दलित पादरी होने का दर्द
भारतीय चर्च अधिकारियों पर धर्मांतरित ईसाइयों के साथ गैर-बराबरी का सलूक करने के आरोप लम्बे समय से लगते रहे है। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों से ईसाई बने करोड़ों लोगों को इस बात की पीड़ा सताती रहती है कि जिन धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक विसंगतियों एवं शोषण के खिलाफ विद्रोह करते हुए उन्होंने चर्च का दामन थामा था, यहां भी उन्हें समानता एवं न्याय नहीं मिल पाया है। चर्च ढांचे पर आज भी उच्चजातीय ईसाइयों का कब्जा है। उन्हीं में से अधिकतर बिशप, पादरी, कार्डीनल, सामाजिक संगठनों के निर्देशक नियुक्त किये जाते है।
दलित ईसाई समुदाय से आए पादरियों की संख्या वैसे ही चर्च ढांचे में नागन्य है। फिर भी अगर किसी आर्च-डायोसिस (धर्म राज्य) में वे एक-दो प्रतिशत भी हो तो भी धर्मांतरित ईसाई समुदाय उनसे बड़ी आशा रखता है। दलित ईसाइयों में आक्रोश एवं निराशा तब बढ़ने लगती है जब उनके बीच से आए पादरियों/ननों के साथ ही आमनवीय व्यवहार शुरु कर दिया जाता है। दरअसल चर्च संसाधनों पर अपना एकाधिकार जमाए बैठे उच्च कलर्जी न तो दलित ईसाइयों और न ही उनके बीच से आए पादरियों/ननों को आगे बढ़ने के समान अवसर देने को तैयार होते हैं।देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों एक स्थानीय दलित ईसाई कैथोलिक पादरी `फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´ के परिवार एवं उनके शुभचिंतकों ने नई दिल्ली स्थित कैथोलिक आर्च डायसिस पर उनके प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया व इस सबंध में उनके बड़े भाई श्री लक्ष्मी चंद ने बिषप विन्संट कान्सासियों को एक ज्ञापन दिया जिसमें उनसे क्षेत्रवाद, एवं जातिवाद के अधार पर व्यवहार न करने की अपील की गई है। फादर विल्यम के परिवार ने कैथोलिक बिशप विन्संट कान्सासियों को याद दिलाया है कि उन्होंने विल्यम को पादरी बनाने में अनेक दुख एवं कष्ट उठाये है, उनका परिवार एवं गांव की बहुसंख्यक जनसंख्या हिन्दू है उनके इस निर्णय (अपने भाई को पादरी बनाना) से उन्हें अपने ही परिवार एवं समाज से जो विरोध झेलना पड़ा उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हरियाणा के मूल निवासी श्री लक्ष्मी चंद का कहना है कि ग्यारह वर्ष के कठिन प्रशिक्षण के बाद जब मेरा भाई प्रेमदास चौधरी से ``फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´´ बनकर चर्च में आया तो हमें इस बात की खुशी थी कि अब `फादर विलियम´ बिना किसी भेदभाव वंचित वर्गों की सेवा करेगा।
`फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´ के बड़े भाई श्री लक्ष्मी चंद ने बिशप विन्संट कान्सासियों को दिये अपने ज्ञापन में कहा है कि उन्हें एवं उनके परिवार को यह जानकर गहरा सदमा पहुंचा है कि उन्होंने अपने जिस भाई (फादर विल्यम) को चर्च की सेवा करने के लिए ईष्वर के नाम पर अर्पित कर दिया था उसके साथ चर्च के अंदर ही क्षेत्रवाद एवं जातिवाद के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है। दिल्ली के पीतमपुरा, कोन्डली, मयूर विहार आदि चर्चों के अंदर उनकी नियुक्ति होते हुए भी उन्हें स्वतंत्रता से कार्य करने से रोकने के लिये बिशप विन्संट कान्सासियों एवं उनके सहजातीय पादरियों ने कई रुकावटें खड़ी की। बिशप विन्संट कान्सासियों को दिये ज्ञापन में अरोप लगया गया है कि वह खुद एवं पादरियों का कलर्जी वर्ग स्थानीय दलित ईसाइयों एवं उनके वर्ग के पादरियों के साथ भाषा, क्षेत्रवाद एवं जातिवाद के अधार पर भेदभाव करता है। कैथोलिक आर्चडायसिस महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय दलित वर्गों से आए पादरियों की राय को कोई महत्व नहीं देता, डायसिस उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पादरियों के लिए अलग नीति का पालन करता है जो कि चर्च सिंद्वातों एवं ईसाइयत के विरुद्ध है।`फादर विलियम´ के परिवार का कहना है कि उनका मकसद बिशप या अन्य का अनादर करना नहीं है उन्हें यह कदम इसलिए उठाना पड़ा कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्य को दूसरो के दुख एवं तकलीफों को कम करने के लिए ``ईसा मसीह´´ के नाम पर भेंट कर दिया था लेकिन यहां तो वह खुद दोयम दर्जे का अपमानित जीवन जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है। प्रन्द्रह वर्षो से ज्यादा की निस्वार्थ चर्च की सेवा करने के बावजूद एक स्थानीय दलित ईसाई होने के कारण `फादर विल्यम´ के साथ यह अन्याय एवं भेदभाव हमें सहन नहीं है, चर्च अधिकारी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाए। खुद `फादर विल्यम´ का कहना है कि आर्च बिशप ने उसे चर्च देने से पहले रिट्रीट (एक तरह से पापों की क्षमा) की शर्त लगा दी. हालांकि चर्च कानून के मुताबिक प्रत्येक पादरी को चार वर्ष में एक बार इसके लिये जाना होता है लेकिन उज्चजातिय पादरियों के न जाने के बाद भी उन्हें ऊचें पदों से नवाजा गया है। दरअसल भारतीय चर्च पर आज भी दक्षिण भारतीय विषेशकर पुर्तगाली लोगों के वंशजों का ही एकाधिकार बना हुआ है यह तथ्य अलग है कि पुर्तगाली यहां की राजनीति में हावी नहीं हो सके, लेकिन उनके वंशज कैथोलिक चर्च पर हावी है, क्योंकि वास्कोडिगामा यहां पोप के द्वारा भेजा गया पात्र था। पुर्तगाली मिशनरियों ने यहां पर पहले से बसे सीरीयन और पुरातन ईसाइयों को जोर-जबरिया अपना दास बना लिया। भले ही भारत पर अंग्रेजों का राज हो गया था किन्तु कैथोलिक चर्च की सत्ता पुर्तगालियों के पास ही थी। केरल और तमिलनाडु के उच्चजातीय ईसाइयों ने इनके साथ मिलकर कार्य करने में ही अपनी भलाई समझी, अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के बाद भी पोप की कूटनीति से कैथोलिक चर्च पर कोई फर्क नहीं पड़ा। `धार्मिक स्चतंत्रता के मूलाधिकार´ ने इन्हें और अधिक शक्ति प्रदान कर दी। जिसके कारण ये और स्वच्छंदता से इठलाने लगे। इनका अंहकार ऊचाइयां छूने लगा। विदेशी मिशनरियों की कृपा से छोड़ी गई अकूत चल और अचल संपति पर अपना एकाधिकार बनाये रखने के लिये चर्च अधिकारियों ने अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिये भारत के वंचित वर्गों के बीच धर्मांतरण का खेल खेलना शुरू कर दिया। अपना संख्या बल बढ़ाते जाने के कारण जहां उन्हें विदेशों से अपार धन मिलने लगा वहीं बढ़ते वोट बैंक के कारण इन्हें भारतीय राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त हो गया।
कैथोलिक चर्च के चौदह हजार पादरियों में इस समय एक हजार से भी कम दलित पादरी है एक सौ साठ बिशपों में से केवल आधा दर्जन ही दलित है। आश्चर्यजनक यह है कि कैथोलिकों की कुल जनसंख्या का सत्तर प्रतिशत धर्मांतरित ईसाई है लेकिन मुठ्ठीभर लोग चर्च के अकूत संसाधनों का दोहन अपने निजी स्वार्थों के लिये कर रहे है। अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने के नाम पर चर्च अधिकारी भारतीय समाज के अंदर विभिन्न समुदायों में लगातार तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों को चला रहे है।
हाल ही में उड़ीसा के कंधमाल जिले में फैली व्यापक हिंसा के कारण दर्जनों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जान माल की भारी क्षाति उठानी पड़ी। वहां अनुसूचित जातियों से धर्मांतरित हुये लाखों `पाण´ जाति के लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलवाने की चर्च अधिकारियों का हठ एक बढ़े तनाव का कारण बन गया। दरअसल अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में धर्मांतरित होने वाले लोग अपना अनुसूचित जाति का दर्जा खो देते है। इस कारण चर्च अधिकारियों को अपने धर्मांतरण के कार्यक्रम चलाने में भी कठनाई आती है इस कठनाई को जड़ से समाप्त करने के लिये चर्च अधिकारी पिछले कई दषकों से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की सूची में ‘ाामिल करवाने को लेकर तथाकथित आदोंलन चला रहा है। उसकी इस सोच का परिणाम दलित ईसाइयों का विकास नही बल्कि अपने लिये नई जमीन की तलाष करना है। पिष्चमी देषों के संसाधनों से युक्त चर्च नेतृत्व की नजर देष के 16 करोड़ दलित हिन्दूओं पर है। चर्च नेतृत्व एक ही तीर से दो षिकार करने की नीति पर चल रहा है कि उसे मौजूदा धर्मातंरित गरीब ईसाइयों को अपने ढाचें में हिस्सेदारी भी न देनी पड़ी और धर्मांतरण की उसकी दुकान भी चलती रहे।भारतीय कैथोलिक चर्च पर वेटिकन के दिशा-निर्देश लागू होते है। वेटिकन ही बिशपों की नियुक्तियां करता है। कैथोलिक बिशप स्थानीय समुदाय को कम महत्व देते है उनके कार्यां में हस्तक्षेप करने वाले पादरियों का उत्पीड़न होना आम बात है। वर्ष 2000 में जेस्यूट पादरी अन्थोनी फर्नांडीज का उत्पीड़न इसलिए किया गया जब उन्होंने धर्म-परिवर्तन जैसा कार्य करने से इन्कार करते हुये बिषपों के असीमित अधिकारों को चौनती दी। झांसी आर्चडायसिस के पादरी हैनरी को स्थानीय गरीब ईसाइयों की वकालत करने के कारण उत्पीड़त होना पड़ा। आज भी देष में सैकड़ों पादरी दलित होने के कारण एवं अपने समुदाय की आवाज उठाने का दंड हाषिए पर खड़े होकर भुगत रहे है। करोड़ो दलित ईसाइयों के संगठन `पुअर क्रििष्चयन लिबरेशन मूवमेंट´ ने चर्च अधिकारियों से मांग की है कि वह दलित ईसाइयों और उनके वर्गों से आये पादरियों/ननों के साथ समान्ता का व्यवहार करे। प्रभु ईसा मसीह के सदेंश के अनुसार वह नमक की तरह रहें अगर नमक बेसुवाद हो गया तो फिर वह किसी काम का नहीं रहेगा, सिवाय इसके कि वह बाहर घूरे पर फेंका जाये और लोगों के पैरों तले रौंदा जायें।
धर्म का धंधा आत्मा का कारोबार
इसमें कोई दो राय नही कि आज चर्च के अधिकतर संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में लिप्त है और उनका पूरा जोर अपनी संख्या बढ़ने पर है। अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाने के नाम पर उनमें भारत के अंदर और बाहर दान-दाताओं के सामने टकराव भी चलते रहते है। कर्नाटक में चर्चों पर हुए हमलों के दौरान यह बात सतह पर आती दिखाई दे रही है।
कर्नाटक में कुछ हिन्दू संगठनों ने `न्यू लाईफ फेलोशिप´ नामक एक संगठन के कामकाज पर एतराज जताया है। उनका कहना है कि संगठन बड़े पैमाने पर वंचित हिन्दुओं के मतांतरण के कार्य में लगा हुआ है। अपनी सफाई में राज्य के सबसे बड़े चर्च संगठन कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ कर्नाटक के सदस्य बिशप डिसूजा ने बकायदा प्रेस कान्फ्रेस करके कहा कि वे मतांतरण की गतिविधियों में लिप्त नहीं है और उनका न्यू लाईफ फेलोशिप संगठन से कोई वास्ता नही है। अंदरुनी सूत्र बताते है कि कैथोलिक का कलर्जी वर्ग अपने अनुयायियों को न्यू लाईफ से बचाने में लगा हुआ है। न्यू लाईफ फालोशिप का गठन चार दशक पूर्व मुंबई में हुआ था। 1983 में पास्टर सैमुअल एवं उनकी धर्मपत्नी के संचालन में इसका कार्यक्षेत्र बेंगलुरु को बनाया गया और कई चर्चों की स्थापना की गई। आज कर्नाटक में न्यू लाईफ के 45 चर्च है जिनमें 15 दक्षिण कर्नाटक में है। राज्य में न्यू लाईफ कुछ कॉलेज भी चलाता है। न्यू लाईफ का मुख्य कार्य `धर्मप्रचार´ ही है हालांकि यह बात दीगर है कि संगठन के अधिकारी अपने को मतांतरण की गतिविधियों से अलग बताते है। सूत्रों की माने तो संगठन कर्नाटक, महाराष्ट्र , तमिलनाडु , केरल, गोवा, दिल्ली, उड़ीसा, उतर प्रदेश एवं पंजाब तक अपने पैर पसारे हुए है। कर्नाटक विशेषकर बेंगलुरु में बैठकर हजारो चर्च संगठन देश के विभिन्न हिस्सों में अपना कारोबार (धर्मप्रचार का कार्य) चला रहे है। दूसरे शब्दों में बेंगलुरु को चर्च अधिकारियों का दूसरा वैटिकन भी कहा जा सकता है। चर्च संगठनों द्वारा देशभर में चलाये जाने वाले शैक्षणिक संस्थान या सामाजिक संगठन धर्मांतरण की जमीन तैयार करने का काम करते है। उस जमीन पर खेती के लिये दूसरा वर्ग (पुरोहित/ पादरी) फिर चर्च के साम्राज्वाद के लिये कार्य करता है। चर्चों या चर्च अधिकारियों के प्रति होने वाली हिंसा के कारण भी मंतातरण की गतिविधियों को बल मिलता है ऐसी घटनाओं के चलते रहने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रति हमदर्दी का वातावरण पैदा होता है और इसी वातावरण का लाभ उठाकर भारतीय चर्च अधिकारी विशाल धन इकट्ठा करते हैं। इसे और ठीक से समझना चाहते हों तो आप विभिन्न बैवसाइटों पर उड़ीसा दंगों के प्रभावितों के नाम पर जारी की गई अपीलों को देख सकते है। उड़ीसा एवं कर्नाटक की घटनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्च अधिकारियों को अपना खेल खेलने का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ है। वे विश्व समुदाय की सहनभूति बटोरने में सफल रहे है, वहीं दूसरी तरफ मतांतरण का विरोध करने वाले संगठन एवं लोग बचाव की मुद्रा में आ गये हैं. आज जिसको कटघरे में खड़ा होकर अपने अपराधों का हिसाब देना चाहिये वही मुद्दई बनकर अपने लिये इंसाफ मांग रहा है इसलिए यह स्थिति धर्मांतरण का विरोध करने वालों के लिये आत्म मंथन करने की है। चर्च अधिकारी विदेशी दान-दाताओं की सहायता से धर्म-प्रचार के कार्य में लगे हुये है. इस समय वंचित एवं आदिवासी समुदाय उनके निशाने पर हैं। दलित वर्ग से ज्यादा आदिवासी समुदाय में मतांतरण करने में चर्च को सफलता मिल रही है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कैथोलिक अनुयायियों की कुल जनसंख्या का 10 प्रतिशत छोटा नागपुर (झारखंड) में है. अभी हिंसक घटनाओं का साक्षी रहे उ़ड़ीसा के कंधमाल में भी ऐसी ही स्थिति है। चर्च साम्राज्यवादी सोच के तहत अपना संख्याबल बढ़ाने के लिए छल और कपट का सहारा लेने से पीछे नही है। आज वो अपनी संख्या 2.5 प्रतिशत बताकर धर्मांतरण की गतिविधियों पर पर्दा डाल देता है परन्तु तथ्य कुछ और है. आज करोड़ों दलित वर्ग के लोग भले ही सरकारी जनगणना में हिन्दू की श्रेणी में शामिल हों लेकिन चर्च अधिकारी उनका मतांतरण करके अपने रिकार्ड में उन्हें अपना अनुयायी बना चुके है (उड़ीसा में पाण समुदाय का मामला सबके सामने है) एक अनुमान के मुताबिक दो नावों की सवारी करने वाले लोगों की संख्या तीन करोड़ से कम नही होगी। ऐसे ही लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलवाने एवं संविधान संशोधन करवाने के लिये चर्च अधिकारी सुप्रीम कोर्ट से लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक का दबाव भारत सरकार पर डलवा रहे है, ताकि उन्हें अपना खेल खेलने में असानी रहे। इवैंजलाईजेशन, यानी ईसाइयत का प्रचार - प्रसार एक बड़ा व्यवसाय है। यह व्यवसाय आत्माओं को बचाने या उनकी फसल उगाने पर निर्भर है। हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक लेख `द बिजनैस ऑफ फेथ´ में बताया गया है कि चर्च अधिकारियों का मुख्य जोर वंचित वर्गों की बस्तियों में छोटे चर्चों का निर्माण करना है. उनमें देश की राजधानी दिल्ली एवं राज्यों की राजधानियां भी शामिल है। चर्च अधिकारी अपने लिये टारगेट समूहों की शिनाख्त करने में भी जुट गये है। इनमें वंचित एवं आदिवासी वर्ग के कुछ समूह आसान टारगेट माने गये है। विभिन्न खेमों में बंटा चर्च बाहर से भले ही अलग - अलग दिखाई देता हो परन्तु इवैंजलाइजेशन को बिना किसी रुकावट के जारी रखने पर वह एकमत है। केरल का बिलीवर्स चर्च पिछले डेड दशक में एक हजार 44 करोड़ रुपये की विदेशी सहायता ले चुका है। के पी योहन्न के नेतृत्व में चलते इस संगठन का मुख्य लक्ष्य आत्माओं की फसल काटना ही है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश आदि में इस का टकराव मतांतरण विरोधी संगठनों से होता ही रहता है।
`पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट´ के वरिष्ठ सहयोगी श्री मेहरबान जेम्स ने जून 2008 में दिल्ली में धर्मांतरित ईसाइयों के राष्ट्रीय सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ईसाई मिशनरियों ने धर्मांतरण को `व्यापार´ बना लिया है। जिन लोगों ने शोषण-मुक्ति की चाह में ईसाइयत को अपनाया था आज वह चर्च के अंदर ही गैर-बराबरी के दंश झेल रहे है। धर्म परिवर्तन के पीछे अगर कोई राजनीतिक मकसद छिपा है या धर्मातरण का काम किसी मल्टीनेशनल कंपनी की तरह चलाये जाने वाले व्यापार में बदल चुका है या वह हमें साम्राज्यवादी ताकतों का पिछलग्गू या औजार बनाता है तो ऐसे धर्मांतरण का विरोध होना चाहिये।
अब आप `सेविंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च´ का उदाहरण ले तो इस चर्च ने साल 2004 में विदेशों से 5850 करोड़ रुपए हासिल किये और इससे 10 लाख लोगों का धर्मपरिवर्तन किया। कनाडा के धर्म प्रचारक रॉनवाट्स जो `सेविंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च´ के साउथ एशिया डिवीजन के अध्यक्ष है, वे व्यापारिक वीजा लेकर 1997 में भारत में दाखिल हुए थे। उस समय तक चर्च के 2 लाख 25 हजार सदस्य थे जो 103 सालों के प्रयास से ईसाई बने थे। लेकिन इन पांच सालों में उनकी संख्या 7 लाख हो गई है। ग्लोबल इवेंजिलिज्म के निर्देशक मार्क फिन्ले ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2004 में 10 लाख 71 हजार 135 लोग ईसाई बनाये गये. यह संख्या पिछले 15 वर्षों में सबसे ज्यादा है। संगठन के दुनियां भर में तीस हजार पास्टर है जो इक्तालीस लाख लोगों को धर्मोपदेश देते है। भारत में 15 से 30 वर्ष के 6 लाख नौजवान/युवा चर्च के प्रचार, धर्मोपदेश में भीड़ जुटाने और चमत्कार करने के कार्य में लगे हुए है। इसमें कैथोलिक एवं अन्य प्रटोस्टेंट चर्च शामिल नही है।
अमरीका की एक संस्था धर्म प्रचार और धर्मांतरण की नई तकनीक से लैस होकर उतरी है। इसके लिए बाकायदा एक निर्माण कम्पनी बनाई गई है। खबर है कि अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने 2001 में फेथ बेस्ट सोशल सर्विसेस नामक एक संगठन बनवाया है। इसके लिए एक नया ह्वाईट हाउस बनाया जाना है जो धर्मांतरण के काम को हर तरह की मदद देगा। इसके निदेशक जिम टोव बनाये गये है जिन्हें धर्मांतरण का विषेशज्ञ माना जाता है। जाहिर है कि भारत में धर्मांतरण को साम्राज्यवादी शह मिली हुई है। कैथोलिक वैटिकन एवं प्रटोस्टेंट यूरोप के देशों के दिशा-निर्देश पर भारत में चर्च का साम्राज्यवाद खड़ा करने में लगे हुए है। एक सत्य और भी है इस तरह के धर्मांतरण का `ईसा मसीह´ की शिक्षाओं से कुछ लेना देना नही है क्योंकि इस तरह के व्यवसाय के चलते उनका (चर्च अधिकारियों) का जीवन कितना वैभव और सुख से भरा है जबकि जिनके बीच वे काम करते हैं वे घोर गरीबी में जी रहे हैं। इस वैभवपूर्ण जीवन के लिए वे पश्चिम के समृद्व देशों में धर्म के नाम पर पैसा बटोरने के लिए कई तरह के हथकंडें अपनाते हैं। इसमें विभिन्न संप्रदायों के बीच घिनौनी प्रतिस्पर्धा भी चलती हैं। अपने-अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए उनमें एक होड़ लगी रहती हैं। हम ईसाई समाज के लोग भी यह समझते हैं कि धर्मांतरण का यह खेल खुद ईसाई समुदाय के हित्त में नही है फिर भी चर्च अधिकारी सदियों पूर्व `ईसाइत´ में मतांतरित हुये अनुयायियों को त्याग कर नई आत्माओं की फसल काटने निकल पड़े है।
ईसाईयत के अपवित्र निशान
आज भारत में धर्मपरिवर्तन धंधा बन चुका है जिसके मूल में राजीनीतिक साम्राज्यवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा लगा हुआ है.
भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों की धारा 25 के तहत भारत के हर नागरिक को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह कोई धर्म अपनाने के लिए आजाद है. लेकिन आज भारत में जो धर्मांतरण हो रहा है उसका एक राजनीतिक मकसद है और यह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के व्यापार में बदल चुका है. यह परावर्तित लोगों को साम्राज्यवादी ताकतों का पिछलग्गू बनाता है इसलिए हम ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि ऐसे प्रयासों को रोका जाना चाहिए.
मैं जब धर्मपरिवर्तन को व्यापार कहता हूं तो यह अनायास नहीं है. इसके पीछे ठोस तथ्य हैं. इसके लिए मैं सेविन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च का उदाहरण पेश करना चाहूंगा.
एक अकेले सेवेन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च ने साल 2004 में विदेशों से 5850 करोड़ रूपये प्राप्त किये. इस पैसे का उपयोग 10 लाख लोगों का धर्मपरिवर्तन करने के लिए किया गया. कनाडा के धर्म-प्रचारक रॉनवाट्स सेवेन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च के दक्षिण एशिया के प्रमुख हैं. 1997 में व्यापारिक वीजा लेकर वे भारत में दाखिल हुए थे. जब वे भारत आये थे तो उस समय इस चर्च के सवा दो लाख सदस्य थे. यह इस चर्च के 103 साल के काम का नतीजा था. लेकिन बाद के पांच सालों में सदस्यों की संख्या अचनाक बहुत तेजी से बढ़ी और यह सात लाख हो गयी. ग्लोबल इन्वेगेलिज्म के निदेशक मार्क फिन्ले ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अकेले 2004 में भारत में 10 लाख 71 हजार 135 लोगों ने ईसाई धर्म ग्रहण किया जो कि पिछले पंद्रह सालों में सर्वाधिक था. यही रिपोर्ट कहती है कि भारत में 15 से 30 वर्ष के 6 लाख नौजवान चर्च के प्रचार, भीड़ को धर्म सभाओं तक लाने व चमत्कारी शो आयोजित करने में लगे हुए हैं.
अब यह ज्यादा स्पष्ट नजर आने लगा है कि धर्म परिवर्तन के काम को साम्राज्यवादी देशों ने अपने हित के कामों में प्रमुख स्थान दिया है. कनाडा की डोरोथी वाट्स एक योजना चला रही हैं जिसका नाम है 10 गांव और 25 घर. यह एक धर्मपरिवर्तन योजना है जो गांवों को अपना निशाना बनाती है. 1998 में 10 गांव कार्यक्रम 17 बार चलाए गये और उससे 9337 लोग ईसा की शरण में पहुंचे. 1999 में यह कार्यक्रम 40 बार आयोजित किया गया और इस साल इससे 40 हजार लोग ईसाई बने. अपने इन शुरूआती नतीजों से उत्साहित होकर डोरोथी वाट्स ने अब 50 गांव योजना शुरू की है. इससे हर महीने 10 हजार लोगों को बैप्टाईज किया जा सकेगा या ईसाई बनाया जा सकेगा.
अमेरिका की मैसिव इवेन्गुलाईजेशन आफ इंडिया नामक संस्था धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन की नयी तकनीकि से लैस होकर इस काम में उतरी है. यूं तो यह योजना 1990 में शुरू की गयी थी लेकिन बुश जूनियर के अमरीकी राष्ट्रपति बनने के बाद इसे गति मिली. इस योजना का असली मकसद है कि भारत को तेजी से ईसाई देश में बदलना है. इस योजना के तहत भारत गरीबों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें ज्यादा से ज्यादा चर्च निर्माण के लिए जगह उपलब्ध कराना है. इस संस्था के पास पैसे की कमी नहीं है और वह एक पास्टर (मुख्य ईसाई प्रचारक) को 10 हजार रूपये मासिक तनख्वाह देती है. एक पास्टर के नीचे जो लड़के काम करते हैं उन्हें तीन से पांच हजार रूपये मासिक दिया जाता है. इसके अलावा गांव में जिन्हें रिसोर्स पर्सन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है उन्हें भी पांच सौ रूपये मासिक दिया जाता है.
धर्म परिवर्तन का असर तब दिखाई पड़ता है जब ईसाई अलग राज्य की मांग करने लगते हैं.या फिर अलग देश का ही सपना देखने लगते हैं. उत्तर पूर्व में नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ त्रिपुरा बाकायदा अलग ईसाई राज्य बनाने का आंदोलन चला रहा है. उसकी घोषणा में साफ लिखा है कि उसे त्रिपुरा को खुदा की राजधानी बनाना है.
अप्रैल सन 2000 में सीआरपीएफ ने बैप्टिस्ट चर्च आफ त्रिपुरा के सचिव को भारी मात्रा में गोला-बारूद, 50 जिलेटिन की छड़ें, 5 किलो पोटेशियम, 2 किलो सल्फर और बम बनाने के दूसरे सामान के साथ गिरफ्तार किया था.
चर्च का दूसरा पदाधिकारी जटन कोलोई ने गिरफ्तार होने पर बयान दिया कि उसने नेशनल लिब्रेशन फ्रण्ट आफ त्रिपुरा के बेस में गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण लिया है.
इन्हीं बातों को देखते हुए हम धर्म परिवर्तन को सही नहीं मानते. अगर धर्मपरिवर्तन साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती, जातीय उत्पीड़न और सामाजिक गैर बराबरी को बढ़ाता है तो हम इसका विरोध करते हैं. अगर वह चर्चों, मिशन, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में उच्च जाति के ईसाईयों का कब्जा बरकार रखता है और गरीबों और दलित ईसाईयों को वहां प्रवेश की भी मनाही होती है तो ऐसे धर्म परिवर्तन का मकसद समझ में आता है.
(मेहरबान जेम्स दलित क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेन्ट के उत्तर प्रदेश के प्रमुख हैं.)
Sunday, January 18, 2009
दलित" शब्द का इस्तेमाल अवैधानिक
दलित" शब्द का इस्तेमाल अवैधानिक
जनवरी 18, 2008,
रायपुर, 18 जनवरीः नेशनल कमिशन ऑफ शेड्यूल कास्ट ने राज्य सरकार से यह कहा है कि सरकारी दस्तावेजों में "दलित" शब्द का इस्तेमाल न किया जाए क्योंकि यह शब्द अवैधानिक है.किमशन ने कहा है कि कई बार दस्तावेजों में "दलित" शब्द का इस्तेमाल "अनुसूचित जाति" की जगह किया जाता है. इस बारे में पूछने पर किमशन ने कहा कि "दलित" शब्द न तो वैधानिक है और न ही कानून में इसका कोई जिक्र है.जबकि "अनुसूचित जाति" शब्द संविधान की धारा 341 में जिक्र किया गया है. यह पत्र सभी राज्यों को भेजा गया है. आदेश का पालन करते हुए राज्य सरकार ने डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और उनके डिपार्टमेंट से "दलित" शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को कहा है.
Sunday, May 27, 2007
दलितों-आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपनाया
दलितों-आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपनाया
दलितों और आदिवासियों के ईसाई धर्म अपनाने का हिंदू संगठन विरोध करते रहे हैं
मुंबई में रविवार को आयोजित धर्मांतरण कार्यक्रम में कई हज़ार दलितों और आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इसमें लगभग 35 हज़ार लोग शामिल हुए. बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने 50 वर्ष पहले बौद्ध धर्म अपनाया था और इसी के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में सबसे ज़्यादा लोग महाराष्ट्र के थे और इनमें वंजारा समुदाय के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी.इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है
आयोजकों ने पाँच लाख लोगों के पहुँचने का दावा किया था लेकिन भीड़ सिर्फ़ 30 से 35 हज़ार लोगों की थी जिनमें से कुछ हज़ार लोगों ने धर्मांतरण कराया. हालाँकि मुख्य आयोजकों में से एक राहुल बोधी का दावा है कि एक लाख लोग धर्मांतरित हुए हैं. इस कार्यक्रम में बौद्ध आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भी आने वाले थे लेकिन अस्वस्थ होने के कारण नहीं पहुँच सके.
कितना असरदार
राजनीति और समाज पर गहरी नज़र रखने वाले योगेंद्र यादव कहते हैं कि यह रस्मी घटना बन गई है. उनका कहना है, "इस बात के कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि धर्मांतरण करने के बाद दलितों और आदिवासियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में कोई बदलाव आता है."वे कहते हैं, "यह बाबा साहेब अंबेडकर की शुरू की हुई परंपरा है जिसे हिंदू वर्ण व्यवस्था के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए दलित प्रतीकात्मक तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन बहुजन समाज पार्टी जैसे दलित नेतृत्व ने अब इसे तिलांजलि दे दी है क्योंकि उन्हें इसका बहुत लाभ नहीं दिखता." दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं
उदित राज
जस्टिस पार्टी के प्रमुख उदित राज धर्मांतरण को जायज ठहराते हुए कहते हैं, "दलितों को इज्जत तभी मिलेगी जब वे मौजूदा सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलेंगे. इसीलिए दलित-आदिवासी बौद्ध धर्म अपना रहे हैं.
"कुछ दक्षिणपंथी हिंदू संगठन इस तरह के धर्मांतरणों का विरोध करते रहे हैं. धर्मांतरण करने वालों को उम्मीद है कि इसके ज़रिए वे उस जातिप्रथा से बाहर निकल सकेंगे जिसमें उन्हें सबसे निचले तबके का माना जाता है. हालांकि सरकार ने दलितों और आदिवासियों को आरक्षण देने की व्यवस्था की है लेकिन इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है.
वैसे भारत में धर्मांतरण एक विवादित विषय रहा है. विशेषकर अगर वह हिंदू से इस्लाम या ईसाइयत में धर्मांतरण हो. हालांकि हिंदुओं के बौद्ध हो जाने का अब तक ख़ास विरोध नहीं हुआ है क्योंकि बौद्ध धर्म को एक तरह से हिंदू धर्म का ही विस्तार माना जाता है.
उत्तर प्रदेश में जाटव आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद धर्मांतरण नहीं कर रहे हैं.
'जागरूक दलितों में धर्मांतरण ज़्यादा'
दलितों में धर्मांतरण सबसे ज़्यादा वो जातियाँ कर रही हैं, जो जागरूक हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से कुछ तरक्की कर गईं हैं. मेरा मानना है कि दलितों का बौद्ध के रूप में धर्मांतरण उन्हें बरगलाकर या जबरन नहीं होता है. अधिकांश दलित सामाजिक और राजनीतिक वजहों से बौद्ध धर्म अपनाते हैं. दलित धर्मांतरण की ये प्रक्रिया राजनीतिक है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसकी अहम वजहें सामाजिक ही होती हैं. हालाँकि वर्ण या जाति व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रही. अन्य जातियों में भी वर्ण व्यवस्था में बदलाव का असर साफ़ देखा जा सकता है.
बेहतरी के लिए संघर्ष
जब दलितों की बात आती है तो कई स्थानों पर अस्पृश्यता का असर अब भी देखा जा सकता है. मुझे लगता है कि यही वजह है कि समाज में बेहतर स्थिति के लिए दलित धर्मांतरण का रुख़ करते हैं.
हालाँकि प्रत्येक राज्य में दलितों की स्थिति अलग-अलग है. मसलन दक्षिण भारत की स्थिति उत्तर से एकदम भिन्न है. दक्षिण के दलित जहाँ भूमिहीन रहे हैं, वहीं उत्तर भारत में दलितों के पास थोड़ी बहुत ज़मीन रही है.
भारत में कई राज्यों में दलितों की सामूहिक हत्या की घटनाएँ भी होती रहती हैं
यह बात सही है कि दलितों की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन कुछेक राज्यों मसलन बिहार और गुजरात में अब भी कई गाँव ऐसे हैं जहाँ आज भी दलितों का बहिष्कार होता है. ये कहा जा सकता है कि जब तक गैरदलित, दलितों पर अत्याचार करते रहेंगे, तब तक धर्मांतरण जैसी चहल-पहल भी होती रहेगी. जहाँ तक मुझे सूचना है महाराष्ट्र में महार और माला जाति अधिक धर्मांतरण कर रही है यानी जो दलित जातियाँ समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ी हैं, धर्मांतरण का प्रतिशत उनमें अधिक है. हालाँकि उत्तर प्रदेश में जाटव इसका अपवाद हैं. ये आर्थिक रूप से मजबूत और जागरूक होने के बावजूद धर्मांतरण नहीं कर रहे हैं.होता ये है कि जब दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देने, बाजा नहीं बजाने देने जैसी घटनाएँ होती हैं तो दलितों में ये संदेश जाता है कि जब तक वे हिंदु व्यवस्था में बने रहेंगे, तब तक अस्पृश्यता से उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी.
जहाँ तक आदिवासियों के धर्मांतरण का सवाल है तो यह दलित धर्मांतरण से एकदम अलग है.
आदिवासियों की अपनी अलग व्यवस्था और पहचान होती है. आदिवासियों का धर्मांतरण ईसाई धर्म में अधिक हो रहा है. इसकी वजह ये भी है कि ऐसा प्रचार किया जाता है कि ईसाई बनने से उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएँ मिलेंगी.हालाँकि धर्मांतरण की यह प्रक्रिया दोतरफा है. यानी कुछ आदिवासी ईसाई धर्म अपना रहा हैं तो कुछ लोग शुद्धिकरण के नाम पर ईसाई बने आदिवासियों को वापस हिंदु धर्म में ला रहे हैं. छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, गुजरात में आदिवासियों के धर्मांतरण से सामाजिक टकराव भी बढ़ रहा है और कभी-कभी तो यह हिंसक रूप भी ले लेता है. आदिवासियों की धर्मांतरण प्रक्रिया दलितों से भिन्न है. जहाँ दलित सामूहिक तौर पर धर्मांतरण कर रहे हैं, वहीं आदिवासियों में ऐसा नहीं है.
धीरूभाई सेठसमाजशास्त्री (आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित)
Saturday, September 24, 2005
'दलित महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया गया'
उड़ीसा की पुलिस ने 29 लोगों की तलाश में एक अभियान छेड़ा है जिन पर आरोप हैं कि उन्होंने कुछ महिलाओं को ज़बर्दस्ती नंगा करके घुमाया था.
यह घटना उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 70 किलोमीटर दूर स्थित भुबनपति गाँव में हुई.
आरोप हैं कि गाँव में उच्च जाति के लोगों ने छह पिछड़ी जाति की महिलाओं को बाल पकड़ कर घसीटा और उन्हें नंगा करके घुमाया.
बताया गया है कि ये महिलाएँ नाई जाति से हैं और उनका क़सूर इतना भर था कि गाँव की एक शादी में उनके पतियों ने अतिथियों के पाँव धोने से इनकार कर दिया था.
इस घटना की शिकार तिलोत्तमा बारिक ने बताया, "मुझे घर से घसीटकर निकाला गया. मेरे साथ मारपीट की गई और नंगा कर घुमाया गया."
इस घटना के बाद गाँव के दलित महिलाएँ और बच्चे डर के कारण घर छोड़कर भाग गए.
इन लोगों को गुरुवार को राजधानी भुवनेश्वर लाया गया और इसमें शोषित लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन अंबेडकर लोहिया विचार मंच ने प्रमुख भूमिका निभाई.
मंच की महासचिव ममता बेहरा का कहना है, हमें केवल आश्वासन ही हाथ लगे हैं.''
एक अन्य नेता रवींद्र बेहरा का कहना था कि प्रशासन घटना को कितनी गंभीरता से लेता है उसका पता इस बात से चलता है कि अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है.
ब्रह्मगिरी पुलिस स्टेशन के प्रभारी दिलीप कुमार त्रिपाठी का कहना था कि इस मामले में जिन 29 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत की गई है, उनकी तलाश में अभियान छेड़ा गया है.
लेकिन उन्होंने इस घटना में यौन उत्पीड़न की बात से इनकार किया.
इस इलाक़े में पिछड़ी जाति के लोगों के उच्च जाति के लोगों के पैर धोने से मना करने के बाद से कुछ समय से तनाव है. पहले भी पिछड़े समुदाय के लोगों पर कई हमले हो चुके हैं.
कुछ महीने पहले हुए हमले में एक शख्स मारा गया था और अनेक लोग घायल हो गए थे.
यहाँ तक कि उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था और उन्हें पानी लेने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी.
Saturday, January 18, 2003
तालाब में दलितों को नहाने से मना
नारायण बारेठ
भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान के एक गाँव के तालाब में दलित लोगों को नहाने से रोकने के मामले में पुलिस ने एक साल बाद कार्रवाई की है और 17 लोगों को गिरफ़्तार किया है.राजधानी जयपुर से 60 किलोमीटर दूर स्थित फागी कस्बे के चकवारा गाँव के सवर्ण गाँव के तालाब में दलितों को नहाने से मना कर रहे थे.दलितों ने इस संबंध में दिसंबर 2001 में उन्होंने रिपोर्ट लिखाई थी.राजस्थान के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वी के गौड़ ने बताया कि इस मामले में अब 17 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.यदि इन लोगों पर दोष साबित हो गया तो इन्हें पाँच साल की सज़ा हो सकती है.भारी विरोध इस घटना के विरोध में राजस्थान में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे.यहाँ तक कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी जिसमें क़रीब एक दर्जन लोग घायल हो गए थे.
दलित समुदायों के लोगों की माँग थी कि फागी क़स्बे के एक मंदिर में उन्हें बेरोकटोक प्रवेश करने दिया जाए और वहाँ के तालाब में भी नहाने की इजाज़त दी जाए. सवर्ण समुदाय के लोगों को इस पर एतराज था.इन लोगों का कहना था कि वे दलित समुदाय के लोगों को न तो मंदिर में घुसने देंगे और न ही तालाब में नहाने देंगे क्योंकि इसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है.
पिछले साल दलित समुदाय के एक व्यक्ति ने फागी क़स्बे के निकट चकवारा गाँव के एक तालाब में स्नान किया था.सवर्ण समुदाय के लोगों ने ऐसा करने के लिए उस पर जुर्माना लगाया था और उसका सामाजिक बहिष्कार किया था.यह मामला तब और तूल पकड़ गया था जब विश्व हिंदू परिषद इसमें कूद पड़ी थी.उसने इस संबंध में सभी वर्ग के लोगों की एक बैठक आयोजित की थी.उनका आरोप था कि इसके पीछे ईसाई मिशनरी हैं और वे हिंदुओं को बांटना चाहते हैं.जबकि ईसाई मिशनरी इसका खंडन करते हैं.
Sunday, October 27, 2002
झज्झर में हुआ धर्मपरिवर्तन
बारह दिन पहले क़रीब पाँच हज़ार 'सवर्ण' हिंदुओं की एक उग्र भीड़ ने पाँच दलितों को गौ हत्या के शक में मार डाला था. यह धर्म परिवर्तन हज़ारों दलित परिवारों के सामने गुड़गाँव स्थित दलितों के रविदास मंदिर में किया गया. इसका आयोजन 'ऑल इंडिया लॉर्ड बुद्धा क्लब' ने किया था.इसके अलावा इसी समारोह में कम से कम दो दलित भी ईसाई बने और एक व्यक्ति ने इस्लाम धर्म क़बूल कर लिया. पुलिस का कहना हैं कि मारे गए दलित चमड़े का व्यापार करते थे और उन पर तब हमला किया गया जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे जिसे ये अन्य खालों के साथ बेचने वाले थे.
ख़बरों में कहा गया है कि दलितों ने सफ़ाई दी थी कि जिस गाय की वे खाल उतार रहे थे वह पहले ही मरी हुई थी.फिर भी उन दलितों को पीट पीट कर मार डाला गया.भीड़ इस अफ़वाह से उत्तेजित थी कि कुछ लोगों ने एक गाय को मार डाला है.दलितों की हत्या के बाद झज्झर में 'सवर्णों' और दलितों के बीच तनाव बढ़ गया था.इसी वजह से राज्य सरकार ने घटना की उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दिए थे. हालाँकि अभी तक तो जाँच की रिपोर्ट नहीं आई है पर धर्मपरिवर्तन के इस समाचार से दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की चिंता ज़रुर बढ़ेगी.
Saturday, September 21, 2002
मंदिर में प्रवेश पर झगड़ा
गाँव के तालाब में सभी को स्नान कराने की इजाजत नहीं है
भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान में शनिवार को एक मंदिर में दाख़िल होने पर उतारू भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और आँसू गैस छोड़ी जिसमें क़रीब एक दर्जन लोग घायल हो गए. अधिकारियों ने कहा है कि राजधानी जयपुर के पास के एक क़स्बे फागी में कुछ दलित लोग मंदिर में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश की अनुमति की माँग कर रहे थे. कुछ सवर्ण हिंदू उनकी इस माँग का विरोध कर रहे थे. पुलिस ने सवर्णों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोली चलाई और आँसू-गैस छोड़ी. क़स्बे में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है जिसके तहत चार या उससे ज़्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा दी गई है.जयपुर के ज़िला अधिकारी सुधांशु पंत ने इलाक़े में स्थिति को नियंत्रण में बताया है और कुछ अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए हैं.
विरोध
विवरण के अनुसार दलित समुदाय के कुछ लोग राज्य के विभिन्न हिस्सों से एकत्र होकर फागी शहर की तरफ़ मार्च कर रहे थे. उनकी माँग थी कि क़स्बे के एक मंदिर में उन्हें बेरोकटोक प्रवेश करने दिया जाए और वहाँ के तालाब में भी नहाने की इजाज़त दी जाए. सवर्ण समुदाय के लोगों को इस पर एतराज था.यह मार्च जैसे ही आगे बढ़ा, सवर्ण समुदाय के लोग उसे रोकने के लिए हिंसा पर उतारू हो गए. ये लोग पुलिस से भी भिड़ गए और उसके साथ भी कुछ देर तक उनकी हाथा-पाई होती रही.इन लोगों का कहना था कि वे दलित समुदाय के लोगों को न तो मंदिर में घुसने देंगे और न ही तालाब में नहाने देंगे क्योंकि इसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है.आख़िरकार दलित समुदाय के लोगों ने अपना मार्च समाप्त कर दिया लेकिन उन्होंने इस भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी रखने का संकल्प भी लिया.
भेदभाव
पिछले साल दलित समुदाय के एक व्यक्ति ने फागी क़स्बे के निकट चकवारा गाँव के एक तालाब में स्नान किया था.सवर्ण समुदाय के लोगों ने ऐसा करने के लिए उस पर जुर्माना लगाया था और उसका सामाजिक बहिष्कार किया था.भारत में जाति प्रथा क़रीब तीन हज़ार साल पुरानी है जिसके अनुसार किसी समुदाय का सामाजिक दर्जा तय होता है.राजस्थान में भी जातिगत भेदभाव की ऐसी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं।
जानकार इस मुद्दे पर अब एकमत नहीं हैं कि क्या जाति प्रथा हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग है या इसे सदियों पहले मध्य एशिया से आने वाले हमलावरों ने लागू किया था।